बोलबा के सरस्वती शिशु मंदिर बनदुर्गा में धूमधाम से मना रक्षाबंधन का पावन पर्व बच्चों ने पेड़ पौधों को रक्षा सूत्र बांधकर लिया पर्यावरण संरक्षण का संकल्प
सरस्वती शिशु मंदिर बनदुर्गा में भैया बहनों ने उत्साहपूर्वक मनाया रक्षाबंधन पर्व।

सिमडेगा के बोलबा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर बनदुर्गा मालसाड़ा में गुरुवार को रक्षाबंधन महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान स्कूली बच्चों ने पेड़-पौधों को रक्षा सूत्र बांधकर पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लिया। विद्यालय में निबंध और मेहंदी प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों ने बढ़-चढ़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
- बोलबा के सरस्वती शिशु मंदिर बनदुर्गा मालसाड़ा में रक्षाबंधन महोत्सव का गरिमामयी आयोजन किया गया।
- भैया-बहनों ने पेड़-पौधों को रक्षा सूत्र बांधकर पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बचाने का सामूहिक संकल्प लिया।
- विद्यालय के प्रधानाचार्य जगरनाथ सिंह ने बच्चों को रक्षाबंधन के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व की जानकारी दी।
- छात्रों के बीच निबंध लेखन और मेहंदी लगाओ प्रतियोगिता का आयोजन कर उनकी रचनात्मक प्रतिभा को सराहा गया।
- भामाशाह सत्यनारायण गोयल द्वारा विद्यालय के बच्चों के बैठने के लिए दरी (चटाई) दान स्वरूप प्रदान की गई।
- इस पावन अवसर पर शिक्षिका देवकी कुमारी, कुमारी जानकी सिंह और पद्मिनी कुमारी समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
सिमडेगा जिले के बोलबा प्रखंड अंतर्गत मालसाड़ा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर बनदुर्गा में रक्षाबंधन का त्योहार बेहद हर्षोल्लास और पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया गया। वनवासी कल्याण केंद्र की शैक्षिक इकाई श्री हरि वनवासी विकास समिति रांची द्वारा संचालित इस विद्यालय में बच्चों ने भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को प्रस्तुत किया। इस उत्सव का मुख्य आकर्षण बच्चों द्वारा प्रकृति की रक्षा के लिए पेड़ों को राखी बांधना रहा। इस कार्यक्रम ने न केवल भाई-बहन के पवित्र प्रेम को दर्शाया, बल्कि सामाजिक समरसता और पर्यावरण संरक्षण का एक बड़ा संदेश भी समाज को दिया।
भारतीय संस्कृति और रक्षाबंधन का महत्व
विद्यालय परिसर में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य जगरनाथ सिंह ने उपस्थित बच्चों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए रक्षाबंधन के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह त्योहार हमारी गौरवशाली सनातन संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है, जो हमें आपस में जोड़ता है।
प्रधानाचार्य जगरनाथ सिंह ने कहा: "यह पावन पर्व केवल भाई-बहन के आपसी प्रेम का नहीं है, बल्कि यह प्रेम, अटूट विश्वास, सुरक्षा, सुदृढ़ संस्कार और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला एक महान पर्व है। आज के समय में इस त्योहार की प्रासंगिकता और बढ़ गई है क्योंकि यह हमें समाज के हर वर्ग की रक्षा और सम्मान करने की प्रेरणा देता है।"
पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संकल्प: पेड़ों को बांधा रक्षा सूत्र
इस वर्ष रक्षाबंधन महोत्सव को एक नया और अनूठा रूप देते हुए विद्यालय के भैया-बहनों ने प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लिया। बनदुर्गा विद्यालय परिसर में स्थित विभिन्न पेड़-पौधों को बच्चों ने अत्यंत प्रेम और आदर के साथ रक्षा सूत्र (राखी) बांधा। इस गतिविधि का मुख्य उद्देश्य बच्चों में बचपन से ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना था।
शिक्षकों ने बच्चों को समझाया कि पेड़-पौधे हमारे जीवनदाता हैं। जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है, वैसे ही ये पेड़ हमें ऑक्सीजन, छाया और फल देकर हमारे जीवन की रक्षा करते हैं। इसलिए, इन पेड़ों की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। बच्चों ने उत्साहपूर्वक इस गतिविधि में भाग लिया और जीवनभर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने तथा नए पौधे लगाने का संकल्प लिया।
निबंध और मेहंदी प्रतियोगिता में बच्चों ने दिखाया कौशल
महोत्सव को और अधिक रचनात्मक और ज्ञानवर्धक बनाने के लिए विद्यालय प्रशासन द्वारा विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था। इसमें मुख्य रूप से निबंध लेखन प्रतियोगिता और मेहंदी लगाओ प्रतियोगिता शामिल थीं।
निबंध प्रतियोगिता के माध्यम से भैया-बहनों ने रक्षाबंधन पर्व के महत्व, भारतीय संस्कृति में इसके स्थान और भाई-बहन के पवित्र संबंधों पर अपने सुंदर और वैचारिक विचार कॉपियों पर उकेरे। बच्चों के लेखन में भारतीय मूल्यों के प्रति गहरी समझ दिखाई दी।
वहीं दूसरी ओर, मेहंदी प्रतियोगिता में छात्राओं ने अपनी कलात्मक क्षमता का बेहतरीन प्रदर्शन किया। छात्राओं ने अपनी हथेलियों पर एक से बढ़कर एक सुंदर, पारंपरिक और आकर्षक मेहंदी के डिजाइन बनाए। इस प्रतियोगिता ने छात्राओं के भीतर छिपी कला और रचनात्मकता को एक बड़ा मंच प्रदान किया।
सामाजिक सहयोग: सत्यनारायण गोयल का सराहनीय योगदान
इस कार्यक्रम के दौरान समाज के सहयोग की एक सुंदर झलक भी देखने को मिली। स्थानीय समाजसेवी और भामाशाह सत्यनारायण गोयल द्वारा विद्यालय के भैया-बहनों की सुविधा के लिए बैठने हेतु दरी (चटाई) दान स्वरूप प्रदान की गई। ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में इस तरह का सामाजिक सहयोग बच्चों के शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है। विद्यालय परिवार ने इस पुनीत कार्य के लिए सत्यनारायण गोयल के प्रति आभार व्यक्त किया और उनके इस कदम की सराहना की।
गरिमामयी उपस्थिति और सामूहिक सहभागिता
पूरे कार्यक्रम के दौरान विद्यालय परिसर में आनंद, उमंग और उत्सव का माहौल बना रहा। भैया-बहनों ने एक-दूसरे को तिलक लगाकर और कलाई पर राखी बांधकर उपहारों का आदान-प्रदान किया और खुशियां बांटीं।
इस भव्य रक्षाबंधन महोत्सव के अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य जगरनाथ सिंह, शिक्षिका देवकी कुमारी, कुमारी जानकी सिंह, पद्मिनी कुमारी मुख्य रूप से उपस्थित रहीं। इन सभी ने बच्चों का मार्गदर्शन किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। कार्यक्रम के अंत में सभी बच्चों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।
सत्य संदेश समाचार: संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से ही बचेगा हमारा अस्तित्व
बनदुर्गा के सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित यह रक्षाबंधन महोत्सव केवल एक रस्म अदायगी नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे हमारी प्राचीन संस्कृति को आधुनिक पर्यावरणीय आवश्यकताओं से जोड़ा जा सकता है। बच्चों द्वारा पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधना हमारी 'वसुधैव कुटुंबकम' और 'प्रकृति पूजक' होने की मूल भावना को दर्शाता है। ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में इस तरह के संस्कारपरक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। सामाजिक सहयोग से विद्यालय की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना भी एक सराहनीय कदम है, जिससे सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए।
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हमारा पर्यावरण और हमारी सांस्कृतिक विरासत ही हमारी वास्तविक पहचान हैं। आज के इस दौर में जब कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, तब हमें भी अपने घरों के आस-पास मौजूद पेड़ों को अपना मित्र मानकर उनकी रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। आइए, इस रक्षाबंधन पर न केवल अपनों की सुरक्षा की प्रतिज्ञा लें, बल्कि अपने पर्यावरण को भी हरा-भरा रखने का प्रण लें।
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