जलडेगा में विश्व हिंदू परिषद का 62वां स्थापना दिवस धूमधाम से संपन्न सनातनी संस्कृति और सामाजिक एकता की रक्षा का लिया गया संकल्प
वीएचपी स्थापना दिवस पर जिला अध्यक्ष कौशल राज सिंह देव ने सामाजिक एकता और संस्कृति संरक्षण पर दिया बल।

सिमडेगा के जलडेगा प्रखंड में विश्व हिंदू परिषद का 62वां स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया। मुख्य अतिथि जिला अध्यक्ष कौशल राज सिंह देव का पारंपरिक स्वागत हुआ। उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा, सामाजिक एकता और विदेशी संस्कृति के प्रभावों से सचेत रहने का आह्वान किया।
- जलडेगा प्रखंड में विश्व हिंदू परिषद का 62वां स्थापना दिवस भव्य और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया।
- मुख्य अतिथि सिमडेगा जिला अध्यक्ष कौशल राज सिंह देव का कार्यकर्ताओं ने ढोल-नगाड़ों से स्वागत किया।
- कार्यक्रम की शुरुआत भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और भारत माता के चित्र पर दीप प्रज्वलित कर की गई।
- जिला अध्यक्ष ने 1964 में मुंबई के सांदीपनि आश्रम में हुई संगठन की स्थापना के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला।
- समाज को जातियों में बांटने वाली ताकतों और धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या के खिलाफ एकजुट होने की अपील की।
- प्राचीन सनातन संस्कृति और प्राकृतिक पूजा-पद्धतियों को भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखने का संकल्प लिया गया।
सिमडेगा जिले के जलडेगा प्रखंड में शुक्रवार को विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का 62वां स्थापना दिवस अत्यंत हर्षोल्लास और गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। इस विशेष अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विश्व हिंदू परिषद के सिमडेगा जिला अध्यक्ष कौशल राज सिंह देव उपस्थित रहे। जलडेगा आगमन पर स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ ढोल-नगाड़ों की थाप पर उनका भव्य स्वागत किया। इस उत्सव में बड़ी संख्या में सनातनी धर्मावलंबी और युवा शामिल हुए, जिन्होंने सामाजिक समरसता और धर्म रक्षा का संकल्प दोहराया।
भव्य स्वागत और दीप प्रज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ
जलडेगा प्रखंड मुख्यालय में आयोजित इस भव्य समारोह की शुरुआत बेहद आध्यात्मिक और पारंपरिक माहौल में हुई। मुख्य अतिथि कौशल राज सिंह देव के कार्यक्रम स्थल पर पहुंचते ही उपस्थित जनसमूह ने जय श्रीराम के गगनभेदी उद्घोष के साथ उनका अभिनंदन किया। इसके पश्चात, मुख्य अतिथि एवं संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम और भारत माता के तैलचित्र के समक्ष विधिवत पुष्प अर्पित किए गए और दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन किया गया। इस दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं और कार्यकर्ताओं ने अपनी समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति गहरी आस्था प्रकट की।
विश्व हिंदू परिषद का गौरवशाली इतिहास और स्थापना के उद्देश्य
समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि कौशल राज सिंह देव ने विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की पृष्ठभूमि और इसके ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए संगठन के मूल उद्देश्यों से अवगत कराया।
कौशल राज सिंह देव ने कहा: "वर्ष 1964 में मुंबई के सांदीपनि आश्रम में जब देश विभिन्न जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर अलग-अलग गुटों में बंटा हुआ था, उस समय विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य विश्व के सभी हिंदुओं को एक छत के नीचे संगठित करना और हिंदू समाज को एकजुट करना था।"
उन्होंने आगे कहा कि हमारे पूर्वजों ने विषम परिस्थितियों में भी अपनी संस्कृति को जीवित रखा। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भी हमारे पूर्वजों ने आधी रोटी खाकर और भूखे पेट रहकर अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष किया। आज हम जिस स्वतंत्र और सुरक्षित परिवेश में अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं, वह उन्हीं के अनवरत संघर्षों और बलिदानों का परिणाम है। इसी वजह से आज भारत में सनातन धर्म का एक विशाल समुदाय शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से निवास कर रहा है।
वर्तमान सामाजिक चुनौतियां और विभाजनकारी ताकतें
अपने संबोधन में जिला अध्यक्ष ने वर्तमान समय में सनातन समाज के समक्ष आ रही आंतरिक और बाह्य चुनौतियों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के समय में समाज को अत्यधिक जागरूक और सजग रहने की आवश्यकता है क्योंकि समाज को कमजोर करने के प्रयास निरंतर जारी हैं।
कौशल राज सिंह देव ने कहा: "वर्तमान समय में समाज को जागने और सजग रहने की आवश्यकता है। विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हिंदू समाज को संगठित करने के उद्देश्य से हुई थी और आजादी के बाद के वर्षों में भी समाज को संगठित रखने का प्रयास लगातार जारी रहा है। लेकिन वर्तमान समय में कई तरह से समाज को तोड़ने और लोगों को अलग-अलग जातियों में बांटने का प्रयास किया जा रहा है।"
उन्होंने आगाह किया कि समाज को जाति और विभिन्न संकीर्ण वर्गों में बांटने की कोशिशों से हमारी सामाजिक समरसता और एकता कमजोर होती है। जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।
धार्मिक ग्रंथों की गलत व्याख्या और विदेशी संस्कृति का प्रभाव
सांस्कृतिक क्षरण के मुद्दों पर बात करते हुए कौशल राज सिंह देव ने बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर हो रहे प्रहारों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सुनियोजित तरीके से सनातनी मूल्यों को निशाना बनाया जा रहा है।
कौशल राज सिंह देव ने कहा: "आज हमारे धार्मिक ग्रंथों और धर्म पुस्तकों की गलत व्याख्या तथा गलत तरीके से प्रकाशन कर समाज में अलग संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि समाज में भ्रम पैदा हो और हिंदू समाज की एकता कमजोर हो। इसके अलावा विदेशी संस्कृति भी तेजी से हावी हो रही है, जिसके कारण हमारी पुरानी सनातन सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं के प्रभावित होने का खतरा है।"
उन्होंने जोर देकर कहा कि इस वैचारिक भटकाव से बचने के लिए युवाओं और बच्चों को अपने मूल ग्रंथों के वास्तविक ज्ञान से परिचित कराना आवश्यक है।
सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक पूजा-पद्धति के संरक्षण का आह्वान
कार्यक्रम के अंतिम चरण में सिमडेगा जिला अध्यक्ष ने प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण को रेखांकित किया। झारखंड की धरती प्राकृतिक पूजा और सनातन परंपराओं का अद्भुत संगम है, जिसे बचाना अत्यंत आवश्यक है।
कौशल राज सिंह देव ने कहा: "अभी भी समय है कि हम सभी जागरूक और सजग हों। हमें अपनी धर्म-संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक पूजा-पद्धतियों को बचाए रखने की आवश्यकता है। हमारी प्राचीन परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहनी चाहिए, ताकि इनका किसी प्रकार से दोहन न हो और हमारा समाज अपनी संस्कृति एवं परंपराओं के साथ निरंतर आगे बढ़ता रहे।"
कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय कार्यकर्ताओं और उपस्थित गणमान्य लोगों ने भी संगठन की स्थापना के उद्देश्यों, हिंदू समाज की एकता, धर्म-संस्कृति के संरक्षण और सामाजिक जागरूकता को लेकर अपने-अपने विचार साझा किए। स्थापना दिवस के इस पावन अवसर पर कार्यकर्ताओं में एक अभूतपूर्व ऊर्जा और उत्साह देखने को मिला, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो गया।
सत्य संदेश समाचार: वैचारिक दृढ़ता और सांस्कृतिक एकजुटता ही समाज का असली संबल
जलडेगा में विश्व हिंदू परिषद का यह स्थापना दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि वर्तमान समय में सनातन समाज के समक्ष खड़ी वैचारिक चुनौतियों पर मंथन का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ है। आज के दौर में जब वैश्विक संस्कृतियों का प्रभाव बढ़ रहा है, तब अपनी जड़ों, पारंपरिक मूल्यों और प्राकृतिक पूजा पद्धतियों को सहेजना बेहद आवश्यक है। समाज को जातियों में बांटकर कमजोर करने वाली ताकतों के खिलाफ इस प्रकार के बौद्धिक विमर्श ग्रामीण क्षेत्रों में नई चेतना का संचार करते हैं। प्रशासन और सामाजिक संगठनों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि भ्रामक प्रचार और सांस्कृतिक दोहन पर लगाम कसी जा सके। हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
हमारी संस्कृति और परंपराएं ही हमारी असली पहचान हैं। आधुनिकता की दौड़ में अपनी प्राचीन विरासत, नैतिक मूल्यों और प्राकृतिक पूजा-पद्धतियों को विस्मृत न होने दें। एक सजग नागरिक के रूप में समाज में समरसता बनाए रखने और विभाजनकारी तत्वों को विफल करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। जब हम एकजुट होंगे, तभी हमारा समाज और राष्ट्र सशक्त बनेगा। आइए, अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का सामूहिक संकल्प लें। इस विचारमंथन पर आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि वर्तमान समय में सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण आवश्यक है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें, इस महत्वपूर्ण संदेश को अपने मित्रों और परिजनों तक पहुंचाएं, और समाज में जागरूकता फैलाने में अपना योगदान दें।
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