सिमडेगा में उपायुक्त कंचन सिंह ने सुरक्षा गृह के बच्चों के साथ मनाया रक्षाबंधन, आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई प्रशिक्षण और बैंक खाता खोलने का दिया निर्देश
उपायुक्त कंचन सिंह ने किशोरों को राखी बांधकर दिया आत्मनिर्भरता का संदेश।

झारखंड के सिमडेगा जिले में उपायुक्त कंचन सिंह ने 'सुरक्षा का स्थान' संस्था में आवासित किशोरों के साथ रक्षाबंधन का त्योहार मनाया। इस दौरान उन्होंने बच्चों को राखी बांधी और उनके हुनर को तराशने के लिए सिलाई प्रशिक्षण देने का निर्देश दिया। सिलाई से होने वाली आय सीधे किशोरों के बैंक खातों में जमा की जाएगी।
- सिमडेगा की उपायुक्त कंचन सिंह ने 'सुरक्षा का स्थान' गृह में आवासित किशोरों के साथ मनाया रक्षाबंधन का पावन पर्व।
- उपायुक्त ने किशोरों को राखी बांधी और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने तथा अपनत्व का अहसास कराया।
- अधिकारियों को किशोरों के लिए सिलाई प्रशिक्षण और आवश्यक सामग्री तुरंत उपलब्ध कराने का सख्त निर्देश दिया।
- तैयार उत्पादों की बिक्री से होने वाली आय को सीधे किशोरों के बैंक खातों में जमा कराया जाएगा।
- इस पहल का मुख्य उद्देश्य किशोरों को संस्थान से बाहर निकलने के बाद आत्मनिर्भर और बेहतर जीवन जीने में मदद करना है।
झारखंड के सिमडेगा जिले से एक बेहद मानवीय और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। रक्षाबंधन के पवित्र त्योहार के अवसर पर सिमडेगा की संवेदनशील उपायुक्त कंचन सिंह ने 'सुरक्षा का स्थान' नामक संरक्षण गृह में रह रहे किशोरों के बीच पहुंचकर खुशियां बांटीं। उपायुक्त ने न केवल किशोरों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा, बल्कि उनके भविष्य को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बड़ी पहल की शुरुआत की। उन्होंने वहां उपस्थित प्रशासनिक अधिकारियों को इन बच्चों के कौशल विकास के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने के निर्देश जारी किए हैं।
'सुरक्षा का स्थान' में उमड़ा अपनत्व का सैलाब
सिमडेगा के 'सुरक्षा का स्थान' (अल्पकालीन आवास गृह/संरक्षण गृह) में रक्षाबंधन के दिन का माहौल सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग था। त्योहारों के सीजन में घर-परिवार से दूर रह रहे किशोरों के चेहरे पर उदासी न छाए, इसके लिए उपायुक्त कंचन सिंह खुद वहां पहुंचीं। उन्होंने प्रत्येक किशोर के पास जाकर उनसे आत्मीय संवाद किया और उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। इस दौरान उन्होंने बच्चों को रक्षाबंधन के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में विस्तार से समझाया। उपायुक्त ने बच्चों को भरोसा दिलाया कि प्रशासन हर कदम पर उनके साथ खड़ा है और उन्हें कभी भी खुद को अकेला या असहाय समझने की आवश्यकता नहीं है।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम: सिलाई प्रशिक्षण का निर्देश
केवल औपचारिकता निभाने के बजाय उपायुक्त ने इन किशोरों के उज्जवल भविष्य की नींव रखने का ठोस प्रयास किया। उन्होंने मौके पर उपस्थित जिला समाज कल्याण विभाग और संरक्षण गृह के अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए। उपायुक्त ने कहा कि इन किशोरों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तत्काल सिलाई प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। इसके लिए जितने भी सिलाई मशीनों और कच्चे माल (धागा, कपड़ा, कैंची आदि) की आवश्यकता है, उसे तुरंत उपलब्ध कराया जाए। प्रशिक्षण के लिए कुशल प्रशिक्षकों की सेवाएं ली जाएं ताकि बच्चे पेशेवर तरीके से बैग, कपड़े और अन्य उपयोगी वस्तुएं सिलना सीख सकें।
उपायुक्त कंचन सिंह ने अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा: "संस्थान में रह रहे इन किशोरों को आत्मनिर्भर बनाना हमारी प्राथमिकता है। इन्हें सिलाई का कौशल सिखाया जाए और इनके द्वारा तैयार किए गए सामानों की बिक्री से प्राप्त आय सीधे इनके खातों में भेजी जाए, ताकि ये भविष्य में अपना जीवनयापन सम्मानजनक ढंग से कर सकें।"
आर्थिक सशक्तिकरण की अनूठी पहल: सीधे खाते में जाएगी आय
इस पूरी योजना की सबसे खास बात यह है कि यह केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि इसे एक व्यावहारिक स्वरोजगार मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा। उपायुक्त कंचन सिंह ने निर्देश दिया कि किशोरों द्वारा सिलाई किए गए सभी सामानों की बाजार में बिक्री सुनिश्चित की जाए। इसके लिए स्थानीय बाजारों, सरकारी प्रदर्शनियों और स्वयं सहायता समूहों के नेटवर्क का उपयोग किया जाएगा।
बिक्री से जो भी शुद्ध आय प्राप्त होगी, उसे सीधे उन किशोरों के व्यक्तिगत बैंक खातों में जमा किया जाएगा। इससे जब ये किशोर वयस्क होकर या अपनी अवधि पूरी कर संस्थान से बाहर निकलेंगे, तो उनके पास एक अच्छी-खासी संचित राशि होगी, जिससे वे अपने जीवन की नई और बेहतर शुरुआत कर सकेंगे। इस योजना से किशोरों में बचत करने की आदत और आर्थिक स्वतंत्रता की भावना विकसित होगी।
सत्य संदेश समाचार: संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का बेजोड़ उदाहरण
सिमडेगा उपायुक्त कंचन सिंह की यह पहल केवल एक प्रशासनिक कर्तव्य नहीं, बल्कि समाज के सबसे वंचित वर्ग के प्रति गहरी संवेदनशीलता और दूरदर्शिता को दर्शाती है। अक्सर सरकारी संरक्षण गृहों में रहने वाले बच्चे संस्थान से बाहर निकलने के बाद आजीविका के संकट से जूझते हैं और पुनः भटकाव की ओर बढ़ जाते हैं। लेकिन उन्हें हुनरमंद बनाकर और उनके काम का उचित पारिश्रमिक सीधे उनके खातों में भेजकर प्रशासन ने उनके सुरक्षित पुनर्वास का मार्ग प्रशस्त किया है। यह मॉडल राज्य के अन्य जिलों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बनना चाहिए।
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किसी भी समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और बेसहारा बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है। सिमडेगा प्रशासन ने जो राह दिखाई है, उस पर चलकर हम भी अपने स्तर पर बदलाव के भागीदार बन सकते हैं। हमें अपने आस-पास के वंचित बच्चों की शिक्षा और कौशल विकास के लिए आगे आना होगा। जब तक हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक पूर्ण सामाजिक विकास संभव नहीं है।
क्या आपको लगता है कि इस तरह की कौशल विकास योजनाएं हर जिले के बाल सुधार और संरक्षण गृहों में अनिवार्य रूप से लागू की जानी चाहिए? अपनी बहुमूल्य राय नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें। इस प्रेरक और सकारात्मक खबर को अधिक से अधिक लोगों तक शेयर करें ताकि अन्य जिलों का प्रशासन और आम नागरिक भी इससे प्रेरणा ले सकें। सजग रहें, सक्रिय बनें और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका निभाएं।
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