विवेकानंद शिशु विद्या मंदिर लचरागढ़ में वैदिक मंत्रोच्चार और मांदर की थाप पर उठाया गया जावा प्रकृति पर्व करम की हुई हर्षोल्लास के साथ शुरुआत
लचरागढ़ के विद्यालय में छात्राओं ने पारंपरिक विधि-विधान से जावा रोपण कर प्रकृति पर्व का शुभारंभ किया।

सिमडेगा के लचरागढ़ स्थित विवेकानंद शिशु विद्या मंदिर में मंगलवार को पारंपरिक श्रद्धा के साथ जावा उठाने की रस्म संपन्न हुई। छात्राओं ने देवनदी से पवित्र बालू लाकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच 12 प्रकार के अनाजों के बीजों का रोपण किया। इस धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही क्षेत्र में प्रकृति पर्व करम की भव्य शुरुआत हो गई है।
- विवेकानंद शिशु विद्या मंदिर लचरागढ़ में मंगलवार को पारंपरिक विधि-विधान और हर्षोल्लास के साथ जावा उठाया गया।
- छात्रावास प्रमुख सुनीति कुमारी और अंजलि कुमारी के नेतृत्व में उपवास रखकर छात्राओं ने देवनदी से पवित्र बालू एकत्रित किया।
- विद्यालय के आचार्य प्रमोद पानीग्राही ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ जावा रोपण का अनुष्ठान संपन्न कराया।
- जावा में गेहूँ, जौ, धान, मड़वा, गोंदली, उड़द, कुर्थी, चना और मकई सहित 12 स्थानीय अनाजों का उपयोग किया गया।
- लोकगायक गोपाल बरला के मांदर की थाप पर छात्राओं ने पारंपरिक करम नृत्य प्रस्तुत कर समां बांध दिया।
झारखंड के सिमडेगा जिले के कोलेबिरा प्रखंड अंतर्गत लचरागढ़ में स्थित विवेकानंद शिशु विद्या मंदिर उच्च विद्यालय में प्रकृति पर्व करम को लेकर उत्साह चरम पर है। मंगलवार को विद्यालय परिसर में पारंपरिक रीति-रिवाजों और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ 'जावा' उठाने का अनुष्ठान संपन्न हुआ। वनवासी कल्याण केंद्र की शैक्षिक इकाई श्रीहरि वनवासी विकास समिति, झारखंड द्वारा संचालित इस प्रतिष्ठित विद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम ने पूरी संस्कृति को जीवंत कर दिया। इस पावन अवसर पर विद्यालय की छात्राओं ने कठिन उपवास रखकर प्रकृति के प्रति अपनी अटूट आस्था का परिचय दिया।
देवनदी से पवित्र बालू लाने की पावन परंपरा
करम पर्व की शुरुआत अत्यंत कठिन और पवित्र नियमों के साथ होती है। मंगलवार की सुबह विद्यालय के छात्रावास की छात्राओं ने पूर्ण निष्ठा के साथ उपवास रखा। छात्रावास प्रमुख सुनीति कुमारी एवं अंजलि कुमारी के नेतृत्व में उपवासधारी छात्राओं का एक दल पारंपरिक गीतों को गाते हुए स्थानीय देवनदी पहुंचा।
वहां पूर्ण पवित्रता के साथ नदी के तल से साफ और शुद्ध बालू एकत्रित किया गया। इस बालू को बांस की बनी नई डलिया (टोकरी) में रखा गया। नदी घाट पर भी संक्षिप्त पूजा-अर्चना की गई, जिसके बाद अत्यंत आदर भाव के साथ इस बालू को सिर पर उठाकर विद्यालय परिसर लाया गया। यह दृश्य भारतीय संस्कृति में नदियों और जल स्रोतों के प्रति गहरी कृतज्ञता को प्रदर्शित करता है।
12 अनाजों के बीजों से जैव विविधता का अनूठा संदेश
विद्यालय पहुंचने के बाद बालू से भरी डलिया को पूजा स्थल पर स्थापित किया गया। इसके पश्चात विद्यालय के आचार्य प्रमोद पानीग्राही ने वैदिक मंत्रोच्चारण और धार्मिक विधि-विधान के साथ जावा रोपण का अनुष्ठान संपन्न कराया। इस जावा में कुल 12 प्रकार के स्थानीय अनाजों के बीजों का उपयोग किया गया, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित अनाज शामिल थे:
1. गेहूँ
2. जौ
3. धान
4. मड़वा
5. गोंदली
6. उड़द
7. कुर्थी
8. चना
9. मकई
इन पारंपरिक बीजों का रोपण इस विश्वास के साथ किया जाता है कि प्रकृति वर्ष के 12 महीनों तक मानव जाति को अन्न-धन से भरपूर रखेगी। यह अनुष्ठान न केवल कृषि समृद्धि की कामना है, बल्कि स्थानीय बीजों के संरक्षण और जैव विविधता को बढ़ावा देने का एक जीवंत संदेश भी है।
मांदर की थाप और पारंपरिक गीतों की गूंज
जावा रोपण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद विद्यालय का पूरा माहौल उत्सव के रंग में सराबोर हो गया। प्रसिद्ध लोकगायक गोपाल बरला के मांदर की थाप और उनके द्वारा गाए गए पारंपरिक करम गीतों ने उपस्थित सभी लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
मांदर की मधुर थाप पर उपवासधारी छात्राओं और अन्य बच्चों ने गोलाकार घेरा बनाकर पारंपरिक करम नृत्य प्रस्तुत किया। गीतों के माध्यम से प्रकृति की आराधना, भाई-बहन के अटूट प्रेम और कृषि संस्कृति की महत्ता को दर्शाया गया। पूरा विद्यालय परिसर झारखंडी संस्कृति की अनूठी छटा से सराबोर नजर आया।
प्रधानाचार्य का संबोधन: संस्कृति और संस्कारों का संरक्षण
इस गरिमामयी अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उपस्थित छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को संबोधित करते हुए करम पर्व के दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डाला।
विद्यालय के प्रधानाचार्य ने कहा: "करम पर्व केवल उपवास या नृत्य का पर्व नहीं है, बल्कि यह वनवासी समाज के समृद्ध कृषि-दर्शन और पर्यावरण चेतना का अनुपम प्रतीक है। जावा का हर अंकुर हमें यह सीख देता है कि जिस तरह हम इन बीजों को सहेजकर अंकुरित करते हैं, उसी तरह हमें अपनी आने वाली पीढ़ी में संस्कारों, अपनी मूल संस्कृति और प्रकृति के संरक्षण के विचारों को रोपना और सींचना है।"
उन्होंने आगे बताया कि अगले 7 दिनों तक उपवास रखने वाली व्रती बहनें पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ इस जावा की सेवा करेंगी। प्रतिदिन सुबह-शाम जावा के चारों ओर पारंपरिक गीत गाए जाएंगे और नृत्य किया जाएगा। इसके बाद करम पूजा के मुख्य दिन करम वृक्ष की डाली लाकर उसकी पूजा की जाएगी और अगले दिन ससम्मान विसर्जन किया जाएगा।
कार्यक्रम में गरिमामयी उपस्थिति और समापन
इस भव्य सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन में विद्यालय के सभी आचार्य, दीदीजी, गैर-शैक्षणिक कर्मचारी और भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। सभी ने इस पारंपरिक अनुष्ठान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की अनुभूति की। कार्यक्रम के सफल आयोजन में विद्यालय प्रबंधन और छात्रावास समिति का विशेष योगदान रहा। अनुष्ठान की समाप्ति के बाद उपस्थित सभी श्रद्धालुओं और बच्चों के बीच श्रद्धापूर्वक प्रसाद का वितरण किया गया, जिसके साथ ही इस पवित्र कार्यक्रम का समापन हुआ।
सत्य संदेश समाचार: प्रकृति और संस्कृति के समन्वय से ही बचेगा हमारा अस्तित्व
लचरागढ़ के विवेकानंद शिशु विद्या मंदिर में आयोजित यह कार्यक्रम हमारी जड़ों की ओर लौटने का एक बेहद सुंदर और अनुकरणीय संदेश देता है। आज के आधुनिक और तकनीक-प्रधान युग में, जहां युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक कृषि पद्धतियों, लोक कलाओं और जैव विविधता के महत्व से दूर होती जा रही है, वहीं विद्यालय स्तर पर ऐसे आयोजनों का होना अत्यंत सराहनीय है। 12 प्रकार के अनाजों का अंकुरण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण और खाद्य सुरक्षा का व्यावहारिक पाठ पढ़ाना है। शिक्षा के साथ-साथ अपनी संस्कृति और मिट्टी से बच्चों को जोड़ना ही सच्ची शिक्षा है, और इसके लिए विद्यालय प्रबंधन बधाई का पात्र है। ऐसे प्रयासों को हर संस्थान में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
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प्रकृति पर्व करम हमें सिखाता है कि हमारा अस्तित्व इस धरती, इसके जंगलों, नदियों और पेड़-पौधों के संरक्षण में ही निहित है। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखने, जल स्रोतों को बचाने और स्थानीय जैव विविधता को अक्षुण्ण रखने का दृढ़ संकल्प लें। अपने बच्चों को अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, गीतों और त्योहारों के वैज्ञानिक महत्व से परिचित कराएं, क्योंकि जो समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, वह अपनी पहचान भी खो देता है।
इस प्रकृति पर्व पर आप अपने घर और समाज में पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या विशेष प्रयास कर रहे हैं? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ जरूर साझा करें। इस ज्ञानवर्धक और प्रेरक जानकारी को अपने मित्रों और परिवार के साथ साझा कर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता फैलाने में अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
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