केतुंगाधाम में करम पूजा की भक्ति में डूबा विद्यालय परिसर नागपुरी गीत नृत्य से सजा सांस्कृतिक उत्सव
करम पूजा में प्रकृति परंपरा और लोकसंस्कृति का सुंदर संगम दिखा।

बानो के केतुंगाधाम स्थित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में बुधवार को करम पूजा महोत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजित हुआ। करम डाली की विधिवत पूजा धाम पुजारी प्रदीप दास गोस्वामी ने मंत्रोच्चार के साथ कराई। विद्यार्थियों, शिक्षकों, मंदिर न्यास समिति, ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की सहभागिता से परिसर भक्तिमय रहा। नागपुरी गीत और पारंपरिक करम नृत्य ने झारखंड की लोकसंस्कृति को जीवंत किया।
- केतुंगाधाम स्थित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में बुधवार शाम करीब 4 बजे करम पूजा शुरू हुई।
- प्रधानाचार्य सुकरा केरकेट्टा के मार्गदर्शन में धाम पुजारी प्रदीप दास गोस्वामी ने करम डाली की विधिवत पूजा कराई।
- पूजा में विद्यार्थियों, आचार्य-आचार्या, न्यास समिति, मानव धर्म रक्षक संघ, ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
- पूजा के बाद नागपुरी करम गीत और पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति ने वातावरण को उत्सवमय बनाया।
- करम पर्व के माध्यम से प्रकृति संरक्षण, सामाजिक एकता और लोकपरंपरा से जुड़ने का संदेश दिया गया।
- बुधवार को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करम डाली का विसर्जन कर महोत्सव का समापन किया गया।
बानो प्रखंड के केतुंगाधाम स्थित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में बुधवार को करम पूजा महोत्सव का आयोजन श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक उत्साह के साथ किया गया। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और करम देवता की आराधना से जुड़े इस पर्व में विद्यालय परिसर में दिनभर भक्तिमय वातावरण बना रहा। पूजा के साथ विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत नागपुरी गीत और पारंपरिक नृत्य ने कार्यक्रम को सांस्कृतिक रंग प्रदान किया।
विधि विधान और मंत्रोच्चार के साथ हुई करम डाली की पूजा
कार्यक्रम का शुभारंभ बुधवार शाम करीब 4 बजे हुआ। विद्यालय के प्रधानाचार्य सुकरा केरकेट्टा के मार्गदर्शन में आयोजित करम पूजा में केतुंगाधाम के धाम पुजारी प्रदीप दास गोस्वामी ने विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ करम डाली की पूजा-अर्चना कराई।
मंत्रोच्चार के बीच करम डाली की विधिवत पूजा संपन्न होते ही विद्यालय परिसर का वातावरण श्रद्धा और भक्ति से भर गया। पूजा के दौरान करम पर्व से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा गया।
विद्यालय की बहनों ने करम राजा की श्रद्धापूर्वक आराधना की। इस दौरान परिवार, समाज और समस्त जनमानस के सुख-समृद्धि, शांति तथा मंगलमय जीवन की कामना की गई। करम पूजा के माध्यम से प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण की भावना को भी सामने रखा गया।
सामूहिक सहभागिता ने बढ़ाई आयोजन की रौनक
करम पूजा में विद्यालय के भैया-बहनों के साथ आचार्य-आचार्या, शिक्षक-शिक्षिकाएं, केतुंगाधाम मंदिर न्यास समिति, मानव धर्म रक्षक संघ, पूर्व छात्र, ग्रामीण तथा बाहर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
करम डाली को केंद्र में रखकर पूजा-अर्चना की गई। विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं की सामूहिक भागीदारी से पूरे आयोजन में अपनापन और सामाजिक एकजुटता का भाव दिखाई दिया। पूजा के बाद बहनों ने श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया।
इस दौरान करम पर्व केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति, सामाजिक सहभागिता और स्थानीय लोकपरंपरा के प्रति सम्मान का अवसर भी बना।
नागपुरी गीत और करम नृत्य ने बांधा समां
पूजन के बाद विद्यालय के विद्यार्थियों ने नागपुरी लोकसंस्कृति से जुड़े पारंपरिक करम गीत और नृत्य प्रस्तुत किए। मांदर और पारंपरिक लोकधुनों की लय पर विद्यार्थियों ने करम नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी।
विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों में झारखंड की मिट्टी की खुशबू, ग्रामीण जीवन की सहजता और अपनी संस्कृति के प्रति लगाव दिखाई दिया। करम गीतों और नृत्य ने उपस्थित ग्रामीणों एवं श्रद्धालुओं को भी आकर्षित किया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों ने अपनी लोकपरंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया। आयोजन में मौजूद लोगों ने भी इस प्रस्तुति का आनंद लिया और विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाया।
शिक्षक शिक्षिकाओं और समिति के सदस्यों की रही सहभागिता
कार्यक्रम में विद्यालय के सभी भैया-बहन, आचार्य-आचार्या एवं शिक्षकगण उपस्थित रहे। प्रधानाचार्य सुकरा केरकेट्टा के साथ आचार्य बंधनु केरकेट्टा, रेणु गोस्वामी, निराली बागे, रेखा तिर्की और शकुंतला सिंह सहित अन्य शिक्षक-शिक्षिकाओं ने कार्यक्रम में सहभागिता की।
वहीं केतुंगाधाम मंदिर न्यास समिति एवं मानव धर्म रक्षक संघ के पदाधिकारी और सदस्य भी करम पूजा में शामिल हुए। इनमें श्याम शिखर सोनार, उमेश कुमार साहू, मनोज दास गोस्वामी, फिरमोहन बड़ाईक, विवेक साहू, रुद्र साहू, शिवम साहू और प्रदीप दास गोस्वामी सहित अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे।
ग्राम बरसलोया के मुखिया संदीप सत मुंडा समेत स्थानीय ग्रामीणों और बाहर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भी पूजा में भाग लिया।
करम पर्व ने दिया प्रकृति और परंपरा से जुड़ने का संदेश
करम पर्व झारखंड की लोकसंस्कृति और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास दिखाई दिया।
पूजा-अर्चना, लोकगीत, नृत्य और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से विद्यार्थियों ने प्रकृति के प्रति सम्मान और लोकसंस्कृति के संरक्षण की भावना को सामने रखा। ऐसे आयोजनों के जरिए स्थानीय परंपराओं से नई पीढ़ी का जुड़ाव मजबूत करने का अवसर मिलता है।
पारंपरिक रीति रिवाज के साथ करम डाली का विसर्जन
बुधवार को करम डाली का विधिवत विसर्जन भी किया गया। विसर्जन कार्यक्रम में विद्यालय के विद्यार्थी, शिक्षकगण, न्यास समिति के पदाधिकारी, ग्रामीण और श्रद्धालु शामिल हुए।
पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके साथ ही विद्यालय परिसर में आयोजित करम पूजा महोत्सव का समापन हुआ। पूरे आयोजन के दौरान भक्ति, उल्लास और लोकसंस्कृति का वातावरण बना रहा।
सत्य संदेश समाचार: करम पूजा ने परंपरा और नई पीढ़ी के बीच जोड़ा संवाद
केतुंगाधाम में आयोजित करम पूजा महोत्सव ने धार्मिक आस्था के साथ झारखंड की लोकसंस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान को भी सामने रखा। विद्यालय के विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता इस आयोजन का महत्वपूर्ण पक्ष रही, क्योंकि गीत और नृत्य के माध्यम से पारंपरिक संस्कृति को आगे बढ़ाने का अवसर मिला।
कार्यक्रम में विद्यालय, मंदिर न्यास समिति, मानव धर्म रक्षक संघ और ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी ने सामाजिक सहभागिता को भी दर्शाया। ऐसे आयोजनों की निरंतरता से स्थानीय लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
करम पर्व से जुड़े प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक एकता के संदेश को विद्यालयी आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों के जीवन से जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों में विद्यार्थियों की भागीदारी और बढ़े, यही इस आयोजन से जुड़ी सकारात्मक दिशा हो सकती है।
हर खबर पर रहेगी हमारी नजर।
लोकसंस्कृति केवल गीत और नृत्य तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज की पहचान, इतिहास और जीवनशैली से जुड़ी होती है।
करम जैसे पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक सहभागिता की भावना को मजबूत करते हैं।
नई पीढ़ी जब अपनी लोकपरंपराओं को समझती और उनमें भाग लेती है, तो सांस्कृतिक विरासत आगे बढ़ती है।
अपने आसपास की परंपराओं, प्राकृतिक संसाधनों और सामुदायिक आयोजनों के प्रति जिम्मेदारी का भाव बनाए रखना जरूरी है।
आपके क्षेत्र में करम पर्व या ऐसे अन्य पारंपरिक आयोजनों की क्या खासियत है, अपनी राय कमेंट में साझा करें।
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