सिमडेगा में बारिश से आशियाना गंवा चुकी बेबस मां की पुकार सुन दौड़ पड़े समाजसेवी भरत प्रसाद खुद घर पहुंचकर थामी लाचार परिवार की बांह
भारी बारिश से बेघर हुए पीड़ित परिवार की मदद के लिए आगे आए समाजसेवी भरत प्रसाद।

सिमडेगा के ठेठईटांगर में भारी बारिश से बेघर हुई अल्मा मिंज की मदद के लिए समाजसेवी भरत प्रसाद आगे आए हैं। उन्होंने रविवार को चिड़राटोली गांव पहुंचकर पीड़ित परिवार को छत के लिए चदरा, राशन और कपड़े वितरित किए। आपदा के इस समय में यह मानवीय पहल पीड़ित परिवार के लिए बड़ा संबल बनी है।
- सिमडेगा के ठेठईटांगर प्रखंड की बाघचट्टा पंचायत के चिड़राटोली में भारी बारिश से ढह गया गरीब परिवार का आशियाना।
- पीड़ित महिला अल्मा मिंज अपने बच्चों के साथ करीब 20 किलोमीटर पैदल चलकर मदद की गुहार लगाने समाजसेवी भरत प्रसाद के पास पहुंची थी।
- रविवार को समाजसेवी भरत प्रसाद ने स्वयं गांव का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया और राहत सामग्री बांटी।
- पीड़ित परिवार को 16 रंगीन चदरा, मच्छरदानी, कंबल, गर्म कपड़े, साड़ियां और बच्चों के लिए खाद्य सामग्री प्रदान की गई।
- इस मानवीय कार्य के दौरान स्थानीय उप मुखिया प्रवीण बड़ाईक सहित कई अन्य ग्रामीण भी मौके पर उपस्थित रहे।
झारखंड के सिमडेगा जिले के ठेठईटांगर प्रखंड में प्राकृतिक आपदा से प्रभावित एक अत्यंत निर्धन परिवार की मदद के लिए मानवता की एक अनूठी मिसाल सामने आई है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण बाघचट्टा पंचायत के चिड़राटोली निवासी अल्मा मिंज का मिट्टी का घर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। इस संकट की घड़ी में बेघर हो चुकी महिला अपने बच्चों की सुरक्षा और आजीविका की गुहार लेकर शनिवार को करीब 20 किलोमीटर की दूरी तय कर सिमडेगा के प्रसिद्ध समाजसेवी सह सब्जी व्यवसायी भरत प्रसाद के पास पहुंची थी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए समाजसेवी ने त्वरित कदम उठाए और रविवार को स्वयं उस सुदूर गांव का दौरा कर पीड़ित परिवार को तात्कालिक राहत पहुंचाई।
आशियाना उजड़ने के बाद 20 किलोमीटर का कठिन सफर
सिमडेगा जिले के ग्रामीण इलाकों में मॉनसून की भारी बारिश ने कई गरीब परिवारों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। बाघचट्टा पंचायत के चिड़राटोली गांव की रहने वाली अल्मा मिंज का परिवार भी इसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ। लगातार हो रही बारिश के कारण अल्मा मिंज के मिट्टी के घर की दीवारें धीरे-धीरे ढह गईं और देखते ही देखते उनका आशियाना पूरी तरह जमींदोज हो गया। इस हादसे के बाद अल्मा के सामने अपने छोटे बच्चों को सुरक्षित रखने और उनके भोजन की व्यवस्था करने की विकट समस्या खड़ी हो गई थी।
सरकारी तंत्र से तत्काल मदद न मिलने की स्थिति में, अल्मा मिंज ने हिम्मत नहीं हारी। वह शनिवार को अपने बच्चों के साथ पैदल ही लगभग 20 किलोमीटर की कठिन दूरी तय कर सिमडेगा मुख्यालय पहुंचीं। वहां उन्होंने स्थानीय स्तर पर अपनी परोपकारी गतिविधियों के लिए जाने जाने वाले समाजसेवी और सब्जी व्यवसायी भरत प्रसाद से मुलाकात की और अपनी आपबीती सुनाई।
पीड़ित परिवार के द्वार पहुंचे समाजसेवी भरत प्रसाद
अल्मा मिंज की दर्दनाक कहानी सुनने के बाद भरत प्रसाद अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने केवल आश्वासन देने के बजाय रविवार को स्वयं चिड़राटोली गांव जाने का निर्णय लिया। रविवार सुबह वे अपनी टीम और आवश्यक राहत सामग्री के साथ अल्मा मिंज के ढहे हुए घर पहुंचे। वहां की वास्तविक स्थिति देखकर वे दंग रह गए, क्योंकि परिवार के पास सिर छुपाने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा था।
भरत प्रसाद ने अल्मा मिंज और उनके बच्चों से आत्मीयता से बातचीत की और उनका ढांढस बंधाया। उन्होंने बच्चों के साथ कुछ समय बिताया और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि इस गरीब परिवार को केवल भोजन ही नहीं, बल्कि एक सुरक्षित छत और बुनियादी कपड़ों की भी अत्यंत आवश्यकता है।
आवश्यक राहत सामग्री और छत के लिए चदरे का वितरण
पीड़ित परिवार की तत्कालीन और दीर्घकालिक आवश्यकताओं को समझते हुए समाजसेवी भरत प्रसाद ने बड़े पैमाने पर राहत सामग्री का इंतजाम किया था। उन्होंने परिवार को नए सिरे से छत बनाने के लिए 16 रंगीन चदरे (टीन शीट) प्रदान किए ताकि वे बारिश से अपना बचाव कर सकें।
इसके साथ ही, उन्होंने निम्नलिखित आवश्यक सामग्रियां भी परिवार को सौंपीं:
- मच्छरों से सुरक्षा के लिए मच्छरदानी।
- ठंड और बारिश से बचने के लिए कंबल और गर्म कपड़े।
- महिलाओं के लिए नई साड़ियां और बच्चों के लिए नए कपड़े।
- खाद्यान्न संकट को दूर करने के लिए एक बोरा आटा और अन्य राशन सामग्री।
- बच्चों के पोषण के लिए ताजे फल और खाने-पीने की विभिन्न सामग्रियां।
अल्मा मिंज और भरत प्रसाद के वक्तव्य
राहत सामग्री पाकर अल्मा मिंज की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने इस संकट काल में मिली त्वरित मदद के लिए समाजसेवी का आभार व्यक्त किया।
अल्मा मिंज ने भावुक होते हुए कहा:
> "लगातार हो रही भारी बारिश में जब मेरे घर का एक-एक हिस्सा गिर गया, तो मुझे लगा कि अब मेरा सब कुछ खत्म हो गया है। बच्चों के साथ रहने और खाने की भारी चिंता सता रही थी। ऐसी विकट परिस्थिति में जब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था, तब भरत प्रसाद जी देवदूत बनकर हमारे घर पहुंचे। इस मदद से मुझे और मेरे बच्चों को जीने की नई हिम्मत मिली है।"
वहीं, समाजसेवी भरत प्रसाद ने समाज के अन्य सक्षम लोगों से भी इस तरह के मामलों में आगे आने की अपील की।
भरत प्रसाद ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा:
> "अल्मा मिंज और उनका परिवार जिस विषम परिस्थिति से गुजर रहा है, वह बेहद पीड़ादायक है। ऐसे कठिन समय में हमारी एक छोटी सी कोशिश भी किसी बेघर परिवार के लिए बहुत बड़ी राहत बन सकती है। मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस परिवार की मदद की है और भविष्य में भी इन्हें हर संभव सहयोग दिया जाएगा। मैं समाज के सभी संपन्न और संवेदनशील नागरिकों से अपील करता हूं कि वे अपने आस-पास के जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आएं।"
इस मानवीय कार्य के दौरान घटनास्थल पर स्थानीय पंचायत के उप मुखिया प्रवीण बड़ाईक सहित कई अन्य सम्मानित ग्रामीण भी उपस्थित थे, जिन्होंने समाजसेवी के इस कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
सत्य संदेश समाचार: सरकारी तंत्र की सुस्ती पर भारी पड़ी मानवीय संवेदना
अल्मा मिंज के आशियाने का ढहना और मदद के लिए उनका 20 किलोमीटर पैदल चलना स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब प्राकृतिक आपदाओं में गरीबों के घर उजड़ जाते हैं, तब सरकारी राहत पहुंचने में इतनी देरी क्यों होती है कि एक बेबस मां को खुद मीलों का सफर तय करना पड़े? समाजसेवी भरत प्रसाद की यह पहल सराहनीय है, लेकिन यह शासन-प्रशासन के लिए एक कड़ा सबक भी है कि वे अपनी फाइलों से बाहर निकलकर धरातल पर त्वरित राहत सुनिश्चित करें। पीड़ित परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अविलंब पक्का मकान आवंटित किया जाना चाहिए।
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एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि संकट के समय हम अपने पड़ोसी और असहाय लोगों के कितने काम आते हैं। प्राकृतिक आपदाएं किसी को भी बेघर कर सकती हैं, लेकिन हमारी संवेदनशीलता और आपसी सहयोग से किसी का उजड़ा हुआ संसार फिर से बस सकता है। आइए, हम सब मिलकर अपने स्तर पर जरूरतमंदों की मदद करने का संकल्प लें।
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