महुआडांड़ के संत जेवियर कॉलेज में करम पर्व की धूम पारंपरिक वेशभूषा में मांदर की थाप पर जमकर थिरके छात्र-छात्राएं
संत जेवियर कॉलेज में पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया प्रकृति पर्व करम।

लातेहार जिले के महुआडांड़ स्थित संत जेवियर कॉलेज में पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ प्रकृति पर्व करम मनाया गया। इस दौरान छात्र-छात्राओं ने मांदर की थाप और पारंपरिक गीतों पर सामूहिक नृत्य कर झारखंड की लोकसंस्कृति की अनूठी छटा बिखेरी। कॉलेज प्रबंधन और शिक्षकों की मौजूदगी में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ना था।
- महुआडांड़ के संत जेवियर कॉलेज में पारंपरिक श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया प्रकृति का महापर्व करम।
- करम राजा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद छात्र-छात्राओं ने प्रस्तुत की मनमोहक करम कथा।
- मांदर की थाप और पारंपरिक करम गीतों पर थिरके विद्यार्थियों के कदम, परिसर में बिखरे लोकसंस्कृति के रंग।
- कॉलेज के प्राचार्य डॉ. फादर एम. के. जोश ने युवाओं से अपनी सांस्कृतिक व प्राकृतिक विरासत को सहेजने की अपील की।
- प्रो. डॉ. प्यारी कुजूर ने करम पर्व के सामाजिक महत्व को रेखांकित करते हुए लोकभाषा और नृत्य को सहेजने पर बल दिया।
- उपासना मिंज ने किया मंच का सफल संचालन और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दी गई करम राजा को विदाई।
झारखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, प्रकृति पूजा और आपसी भाईचारे का प्रतीक करम पर्व लातेहार जिले के महुआडांड़ स्थित संत जेवियर कॉलेज (ऑटोनॉमस) में बेहद भव्य और पारंपरिक अंदाज में मनाया गया। इस विशेष उत्सव के दौरान पूरा महाविद्यालय परिसर मांदर की थाप, करम गीतों की मधुर गूंज और थिरकते कदमों से जीवंत हो उठा। पारंपरिक वेशभूषा में सजे छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को ऐतिहासिक और यादगार बना दिया। इस उत्सव ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि आधुनिकता की दौड़ में युवाओं को अपनी प्राचीन लोक परंपराओं से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम भी प्रदान किया।
करम राजा की स्थापना और विधि-विधान से पूजा-अर्चना
संत जेवियर कॉलेज परिसर में आयोजित इस भव्य करम महोत्सव की शुरुआत पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई। विद्यार्थियों ने पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ करम राजा (करम वृक्ष की डाल) की स्थापना की। इसके बाद योग्य पुरोहितों और छात्र-छात्राओं ने मिलकर करम राजा की विशेष पूजा-अर्चना की। पूजा के पश्चात उपस्थित सभी लोगों के समक्ष करम कथा का वाचन किया गया। इस कथा के माध्यम से करम पर्व की पौराणिक मान्यताओं, मानव जीवन में प्रकृति के महत्व और सामाजिक एकता के संदेश को बेहद सरल और प्रभावी ढंग से समझाया गया। कथा श्रवण के दौरान पूरा माहौल भक्तिमय और शांत नजर आया।
मांदर की थाप पर थिरके कदम, बिखरे लोकसंस्कृति के रंग
पूजा संपन्न होने के बाद कार्यक्रम का सबसे मनमोहक और ऊर्जावान चरण शुरू हुआ। पारंपरिक लाल-सफेद पाड़ वाली साड़ियों और पारंपरिक परिधानों में सजे छात्र-छात्राओं ने मांदर, नगाड़े और ढाक की थाप पर सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया। करम गीतों की मधुर धुनों पर थिरकते कदमों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। विद्यार्थियों का उत्साह देखते ही बन रहा था, और जल्द ही इस नृत्य में कॉलेज के शिक्षक-शिक्षिकाएं भी शामिल हो गए। इस सामूहिक भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि संस्कृति और परंपराएं समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में बांधने की शक्ति रखती हैं।
"प्रकृति और संस्कृति से जुड़ाव ही हमारी असली पहचान"
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. फादर एम. के. जोश ने इस अवसर पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए अपनी संस्कृति को बचाने का संदेश दिया।
डॉ. फादर एम. के. जोश ने कहा: "करम पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के साथ हमारे गहरे व अटूट संबंध का जीवंत प्रतीक है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ उनकी जड़ों और पारंपरिक मूल्यों से जोड़ते हैं। हमें अपनी प्राकृतिक संपदा और लोक परंपराओं को सहेजने का संकल्प लेना चाहिए।"
इसी क्रम में प्रो. डॉ. प्यारी कुजूर ने भी करम पर्व के सामाजिक और व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि करम पूजा हमें सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण की सीख देती है।
प्रो. डॉ. प्यारी कुजूर ने कहा: "करम पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। आज की युवा पीढ़ी को अपनी लोकभाषा, लोकगीत, संगीत और पारंपरिक नृत्य कला को न केवल सीखना चाहिए, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए। यही हमारी वास्तविक पहचान है।"
उपासना मिंज का सफल मंच संचालन और गरिमामयी विदाई
इस पूरे सांस्कृतिक उत्सव को सुव्यवस्थित और प्रभावी ढंग से संचालित करने में उपासना मिंज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मंच संचालन करते हुए करम पर्व की ऐतिहासिकता, इसकी विभिन्न रीतियों और झारखंडी संस्कृति में इसके महत्व से सभी को अवगत कराया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार करम राजा को भावपूर्ण विदाई दी गई। गाजे-बाजे और विसर्जन गीतों के साथ विद्यार्थियों ने करम राजा की डाल को विसर्जित किया, जिससे पूरा परिसर भावुकता और उल्लास के अनूठे संगम का गवाह बना।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्ति और शिक्षक
संत जेवियर कॉलेज के इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में महाविद्यालय परिवार के सभी सदस्यों का सराहनीय योगदान रहा। कार्यक्रम में मुख्य रूप से फा. समीर, फा. लियो, फा. राजीप, सिस्टर चन्द्रोदया, प्रो. मनीषा, प्रो. शेफाली, प्रो. रॉजी सुष्मिता, प्रो. बंसती, प्रो. अंकिता, प्रो. आदिति, प्रो. रेचेल, प्रो. सुष्मिता, प्रो. सुकुट, प्रो. रोनित, प्रो. शशि, प्रो. मन्नू, प्रो. जामेश एवं प्रो. मोनिका उपस्थित रहीं।
इसके साथ ही कॉलेज के शिक्षकेत्तर कर्मचारियों ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें अनोरा दीदी, सुनीता दीदी, क्रिस्टीना दीदी, प्रेमा, सरोज, नीलम, अशोक, सुचित, जयप्रकाश एवं संतोष शामिल थे। इन सभी की उपस्थिति और सक्रिय सहयोग ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया।
सत्य संदेश समाचार: लोकसंस्कृति का संरक्षण ही आधुनिक शिक्षा का वास्तविक आधार
संत जेवियर कॉलेज, महुआडांड़ में आयोजित यह करम महोत्सव स्पष्ट करता है कि आधुनिक शिक्षा के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना आवश्यक है। शैक्षणिक संस्थानों द्वारा ऐसे पारंपरिक त्योहारों का आयोजन न केवल विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों का विकास करता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी जिम्मेदारी को भी सुदृढ़ करता है। आज जब वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संकट गहरा रहा है, तब झारखंड की यह प्रकृति-पूजक संस्कृति पूरी दुनिया को जीने की सही राह दिखाती है। ऐसे आयोजनों को हर स्तर पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी पहचान पर गर्व कर सके।
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झारखंड की माटी की खुशबू और हमारी सांस्कृतिक पहचान ही हमारी असली ताकत है। करम पर्व हमें सिखाता है कि हम प्रकृति के ऋणी हैं और इसका संरक्षण हमारा परम कर्तव्य है। आइए, आधुनिकता के इस दौर में अपनी भाषा, अपने लोकगीतों और अपनी समृद्ध परंपराओं को जीवित रखने का संकल्प लें। एक जागरूक नागरिक के रूप में अपनी संस्कृति के दूत बनें और इसे वैश्विक पटल पर पहचान दिलाएं।
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